यह सचमुच आसान है:
पृथ्वी का आकार नहीं बढता है,
किन्तु मनुश्यों की संख्या में गुणोन्तर बृद्वि हो रही है।

इसका अर्थ यह है कि:
प्रत्येक व्यक्ति के लिये प्रत्येक वस्तु की कमी होना।
पौधों और प्राणियों के लिये स्थान की कमी होना।

हम वायु, जल, वन और वन्यजीवों की सुरक्षा के लिये चाहे जितना भी संघर्श कर लें, उसे तीव्र गति से बढ रह मानवीय आवादी अत्यन्त अल्प समय में नश्ट करने में लगी हुई है।

संसाधनों पर अधिकार के लिये संघर्श पहले ही षुरू हो चुका है और अभी भी अधिकांष लोगों द्वारा समस्या के मूल कारण की उपेक्षा की जा रही है और कुछ लोगों द्वारा इसे नकारा जा रहा है।

क्या आदि मानव (होमोसेपिएंस) ने अपनी सीमाओं का पर्याप्त निर्धारण किया हैघ् अथवा उसकी बुद्वि मात्र अपने पेट और जेब को भरने तक ही कार्य करती है और अन्य जीवधारियों केा विस्थापित करने में लगी रहती हैघ्

इसका परिणाम होगा कि हमें अन्तत: गरीबी, विश, भूख और मृत्यु के काले अन्धकार के साम्राज्य में विलीन होना होगा।

इस सबका मात्र एक ही समाधान है: तीबत्रा से बढती जनसंख्या वृद्वि केा रोकना।